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📅 Published on October 31, 2026 • ✍️ By Abhisek

Can a Third Party Challenge a Compromise Decree?


क्या कोई तीसरा व्यक्ति समझौता डिक्री (Compromise Decree) को चुनौती दे सकता है? सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

1. प्रस्तावना

जब किसी दीवानी मुकदमे (Civil Suit) में दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद का समाधान कर लेते हैं और न्यायालय उस समझौते के आधार पर डिक्री पारित कर देता है, तो इसे समझौता डिक्री (Compromise Decree) कहा जाता है।

आमतौर पर ऐसी डिक्री के बाद विवाद समाप्त हो जाता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न तब उत्पन्न होता है, जब दो पक्षों के बीच हुआ समझौता किसी ऐसे तीसरे व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करता है, जो न तो मूल मुकदमे में पक्षकार था और न ही समझौते में शामिल था।

क्या ऐसा तीसरा व्यक्ति समझौता डिक्री को चुनौती दे सकता है? क्या CPC की धारा 96(3) उसे अपील करने से रोकती है?

इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी तीसरे व्यक्ति के स्वतंत्र कानूनी अधिकार या हित समझौता डिक्री से प्रभावित होते हैं, तो वह अपीलीय न्यायालय से अनुमति लेकर उस डिक्री को चुनौती दे सकता है।

हालाँकि, केवल तीसरा व्यक्ति होना पर्याप्त नहीं है। उसे यह दिखाना होगा कि डिक्री से उसके वास्तविक और कानूनी रूप से मान्य अधिकार प्रभावित हुए हैं।

यह निर्णय संपत्ति विवादों, उत्तराधिकार संबंधी मामलों और अन्य दीवानी मुकदमों के लिए विशेष महत्व रखता है।

2. यह क्यों महत्वपूर्ण है?

समझौता डिक्री का आधार पक्षकारों की आपसी सहमति होती है। लेकिन दो व्यक्तियों की सहमति किसी ऐसे व्यक्ति के अधिकारों को अपने आप समाप्त नहीं कर सकती, जो उस समझौते का हिस्सा ही नहीं था।

उदाहरण के लिए, A और B किसी संपत्ति को लेकर समझौता कर लेते हैं, जबकि उसी संपत्ति पर C का भी स्वतंत्र स्वामित्व या उत्तराधिकार का अधिकार है।

यदि न्यायालय A और B के समझौते के आधार पर डिक्री पारित कर देता है और उससे C के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो यह प्रश्न उठेगा कि C को कानूनी उपचार क्यों नहीं मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में तीन स्थितियों के बीच अंतर स्पष्ट किया है:

  • वे पक्षकार जिन्होंने स्वेच्छा से समझौता किया है।

  • वे पक्षकार जो समझौते की वैधता या अस्तित्व को चुनौती देते हैं।

  • वे तीसरे व्यक्ति जिनके स्वतंत्र कानूनी अधिकार समझौता डिक्री से प्रभावित होते हैं।

इस निर्णय से CPC की धारा 96(3) और आदेश 23 के नियम 3 एवं 3A की सही व्याख्या समझने में सहायता मिलती है।

3. विस्तृत कानूनी विश्लेषण

A. समझौता डिक्री क्या होती है?

समझौता डिक्री का प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 23 नियम 3 में दिया गया है।

इस नियम के अनुसार, यदि न्यायालय संतुष्ट है कि मुकदमे का पूरा या कुछ हिस्सा पक्षकारों के बीच किसी वैध लिखित समझौते द्वारा सुलझा लिया गया है, तो न्यायालय उस समझौते को रिकॉर्ड करके उसके अनुसार डिक्री पारित कर सकता है।

समझौता डिक्री की दो मुख्य विशेषताएँ हैं:

  1. यह पक्षकारों के बीच हुए समझौते को न्यायालय के रिकॉर्ड में लाती है।

  2. इससे समझौते को न्यायिक डिक्री का कानूनी प्रभाव प्राप्त होता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि दो पक्षों के बीच हुआ समझौता किसी तीसरे व्यक्ति के स्वतंत्र अधिकारों को भी समाप्त कर सकता है।

B. CPC की धारा 96(3) क्या कहती है?

धारा 96(3) के अनुसार:

"No appeal shall lie from a decree passed by the Court with the consent of parties."

अर्थात न्यायालय द्वारा पक्षकारों की सहमति से पारित डिक्री के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह है कि जो पक्षकार स्वेच्छा से समझौता करके डिक्री प्राप्त करते हैं, वे बाद में केवल अपना विचार बदल जाने के कारण उसी डिक्री के विरुद्ध सामान्य अपील न कर सकें।

उदाहरण के लिए, A और B किसी संपत्ति विवाद में समझौता करते हैं और न्यायालय उस आधार पर डिक्री पारित कर देता है। बाद में A केवल इसलिए अपील नहीं कर सकता कि अब वह उस समझौते से संतुष्ट नहीं है।

लेकिन यदि C न तो मूल मुकदमे का पक्षकार था और न ही समझौते में शामिल था, तो उसकी स्थिति अलग होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धारा 96(3) का प्रतिबंध ऐसे तीसरे व्यक्ति पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता, जिसके स्वतंत्र कानूनी अधिकार डिक्री से प्रभावित हो रहे हों।

C. आदेश 23 नियम 3 और नियम 3A की भूमिका

इन दोनों नियमों का समझौता डिक्री को चुनौती देने के अधिकार से सीधा संबंध है।

आदेश 23 नियम 3 – मुकदमे का समझौता

इस नियम के अनुसार न्यायालय किसी वैध लिखित समझौते को रिकॉर्ड करके उसके अनुसार डिक्री पारित कर सकता है।

इसके परंतुक (Proviso) के अनुसार, यदि एक पक्ष समझौता होने का दावा करता है और दूसरा पक्ष इससे इनकार करता है, तो न्यायालय को इस प्रश्न का निर्णय करना होगा।

इस नियम का स्पष्टीकरण यह भी बताता है कि भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अंतर्गत शून्य या शून्यकरणीय (Void or Voidable) समझौते को वैध समझौता नहीं माना जाएगा।

आदेश 23 नियम 3A – वाद दायर करने पर रोक

इस नियम के अनुसार, केवल इस आधार पर कि जिस समझौते के आधार पर डिक्री पारित हुई थी, वह वैध नहीं था, उस डिक्री को रद्द कराने के लिए अलग से नया वाद दायर नहीं किया जा सकता।

इसका उद्देश्य समझौता डिक्री को चुनौती देने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन प्रतिबंधों को समझौते के पक्षकारों के संदर्भ में समझना होगा। इन्हें किसी तीसरे व्यक्ति के स्वतंत्र कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए अपीलीय उपचार प्राप्त करने के रास्ते में स्वतः बाधा नहीं बनाया जा सकता।

D. सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: Girishbhai Natwarlal Patel v. Gautam Punjabhai Palkhiwala (2026)

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय – 30 अक्टूबर 2026

Girishbhai Natwarlal Patel v. Gautam Punjabhai Palkhiwala (Dead) by LRs & Ors., 2026 INSC 1177 में सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया कि क्या ऐसे व्यक्ति, जो मूल दीवानी मुकदमे के पक्षकार नहीं थे, समझौता डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति प्राप्त कर सकते हैं।

मामले का विवरण

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय

  • निर्णय की तारीख: 30 अक्टूबर 2026

  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन

  • वाद संख्या: Civil Appeal Nos. 14017–14018 of 2026

  • संबंधित प्रावधान: CPC की धारा 96(3), आदेश 23 नियम 3 और नियम 3A।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक भूमि से संबंधित था, जिसमें संविदा के विशिष्ट पालन (Specific Performance of Contract) के मुकदमे में 29 अप्रैल 2013 को समझौता डिक्री पारित की गई थी।

इस मामले में प्रतिवादी संख्या 1 से 9 तक मूल मुकदमे के पक्षकार नहीं थे और न ही वे समझौते में शामिल थे।

बाद में उन्होंने दावा किया कि समझौता डिक्री और उसके आधार पर किए गए लेन-देन से भूमि में उनके स्वतंत्र कानूनी हित प्रभावित हुए हैं।

उन्होंने गुजरात हाई कोर्ट में समझौता डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति मांगी।

गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें अपील की अनुमति प्रदान की और लगभग 11 वर्ष की देरी को भी माफ कर दिया। विवादित संपत्ति के संबंध में अंतरिम संरक्षण भी प्रदान किया गया।

इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में इन आदेशों को चुनौती दी। उसका तर्क था कि CPC की धारा 96(3) और आदेश 23 नियम 3A के कारण कोई तीसरा व्यक्ति समझौता डिक्री के विरुद्ध अपील नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्णय दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि समझौते का बाहरी व्यक्ति होने के कारण किसी तीसरे व्यक्ति को डिक्री चुनौती देने से स्वतः रोका जा सकता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति न तो मूल मुकदमे का पक्षकार था और न ही समझौते का हिस्सा था, उसे केवल इसलिए समझौते के लिए सहमत नहीं माना जा सकता क्योंकि अन्य व्यक्तियों ने आपस में समझौता कर लिया था।

न्यायालय के अनुसार, समझौता डिक्री से उत्पन्न Estoppel अर्थात प्रतिबंधात्मक कानूनी प्रभाव मुख्य रूप से उन पक्षकारों पर लागू होता है जिन्होंने समझौता किया था। इसे स्वतंत्र कानूनी अधिकारों का दावा करने वाले बाहरी व्यक्ति पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता।

हालाँकि, ऐसे तीसरे व्यक्ति को प्रथम दृष्टया यह दिखाना होगा कि उसका संबंधित संपत्ति या विषय में वास्तविक और कानूनी रूप से मान्य हित है, जो डिक्री से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।

इसके अतिरिक्त, उसे अपीलीय न्यायालय से अपील करने की अनुमति (Leave to Appeal) प्राप्त करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत

इस निर्णय से निम्नलिखित सिद्धांत स्पष्ट होते हैं:

  • समझौता डिक्री का बाहरी व्यक्ति धारा 96(3) के प्रतिबंध से स्वतः प्रभावित नहीं होता।

  • ऐसा व्यक्ति धारा 96 CPC के अंतर्गत अपीलीय न्यायालय की अनुमति लेकर अपील कर सकता है।

  • उसे प्रथम दृष्टया यह दिखाना होगा कि डिक्री से उसके स्वतंत्र कानूनी अधिकार प्रभावित हुए हैं।

  • अपीलीय न्यायालय को ऐसे आवेदन पर गैर-पक्षकारों की अपील से संबंधित स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार विचार करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा अपील की अनुमति देने और देरी माफ करने के निर्णय को बरकरार रखा।

हालाँकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने भूमि के वास्तविक स्वामित्व या धोखाधड़ी और मिलीभगत के आरोपों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इन प्रश्नों पर अपील में कानून के अनुसार विचार किया जाना बाकी है।

E. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के महत्वपूर्ण निर्णय

इस कानूनी स्थिति को समझने के लिए पहले दिए गए कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों को भी देखना आवश्यक है।

1. Pushpa Devi Bhagat v. Rajinder Singh (2006), (2006) 5 SCC 566

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि समझौते का कोई पक्षकार समझौता डिक्री को चुनौती देना चाहता है, तो उसे सामान्यतः आदेश 23 नियम 3 के परंतुक के अंतर्गत उसी न्यायालय में आवेदन करना होगा जिसने समझौता रिकॉर्ड किया था।

न्यायालय ने धारा 96(3) और आदेश 23 नियम 3A के कानूनी प्रभाव को भी स्पष्ट किया।

2. Triloki Nath Singh v. Anirudh Singh (2020), (2020) 6 SCC 629

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया कि क्या ऐसा व्यक्ति, जिसने मूल मुकदमे के किसी पक्षकार से संपत्ति का अधिकार प्राप्त किया हो, समझौता डिक्री को चुनौती देने के लिए अलग से वाद दायर कर सकता है।

न्यायालय ने उस मामले की परिस्थितियों में आदेश 23 नियम 3A के प्रतिबंध को लागू माना।

लेकिन 2026 के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने फैसले से अंतर स्पष्ट किया। Girishbhai Natwarlal Patel मामले में अपील की अनुमति मांगने वाले व्यक्ति अपने स्वतंत्र अधिकारों का दावा कर रहे थे और उनका दावा मूल समझौते के किसी पक्षकार से प्राप्त अधिकार पर आधारित नहीं था।

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F. तीसरा व्यक्ति कब अपील की अनुमति प्राप्त कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अपील की अनुमति मांगने वाले व्यक्ति को वास्तविक कानूनी शिकायत दिखानी होगी।

इसके लिए निम्नलिखित बातें महत्वपूर्ण हैं:

  1. स्वतंत्र कानूनी हित: आवेदक को यह दिखाना होगा कि विवादित विषय या संपत्ति में उसका कानूनी रूप से मान्य हित है।

  2. वास्तविक प्रतिकूल प्रभाव: डिक्री से उसके कानूनी अधिकार प्रभावित या खतरे में पड़े होने चाहिए।

  3. विवादित विषय से संबंध: आवेदक का संपत्ति या प्रभावित अधिकारों से पर्याप्त कानूनी संबंध होना चाहिए।

  4. अपीलीय न्यायालय की अनुमति: केवल गैर-पक्षकार होने के आधार पर अपील करने का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

  5. मामले की परिस्थितियों का परीक्षण: न्यायालय को उपलब्ध दस्तावेजों और मामले की परिस्थितियों की जाँच करनी होगी।

केवल काल्पनिक, दूरस्थ या अप्रत्यक्ष हित रखने वाला व्यक्ति अपील की अनुमति को अपना अधिकार नहीं मान सकता।

4. मुख्य बातें (Key Takeaways)

  • तीसरा व्यक्ति समझौता डिक्री को चुनौती दे सकता है, यदि उसके स्वतंत्र कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं।

  • CPC की धारा 96(3) प्रत्येक तीसरे व्यक्ति की अपील पर स्वतः रोक नहीं लगाती।

  • अपील के लिए अपीलीय न्यायालय की अनुमति आवश्यक है।

  • आवेदक को प्रथम दृष्टया वास्तविक कानूनी हित दिखाना होगा।

  • आदेश 23 नियम 3A के अंतर्गत निर्धारित परिस्थितियों में अलग से वाद दायर करने पर रोक है।

  • समझौते की वैधता या अस्तित्व को चुनौती देने वाला पक्षकार सामान्यतः आदेश 23 नियम 3 के अंतर्गत उसी न्यायालय में जाएगा जिसने समझौता रिकॉर्ड किया था।

  • केवल डिक्री से असहमति होने के कारण कोई तीसरा व्यक्ति उसे चुनौती नहीं दे सकता।

  • Girishbhai Natwarlal Patel (2026 INSC 1177) इस कानूनी अंतर को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है।

5. वास्तविक जीवन में इसका उपयोग (Real-World Application)

उदाहरण 1: उत्तराधिकार और संपत्ति विवाद

मान लीजिए A और B पैतृक संपत्ति को लेकर आपस में समझौता कर लेते हैं। लेकिन उसी संपत्ति में C का भी स्वतंत्र स्वामित्व या उत्तराधिकार का अधिकार है और C मूल मुकदमे का पक्षकार नहीं था।

यदि A और B के समझौते पर पारित डिक्री से C के स्वतंत्र कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं, तो C धारा 96 CPC के अंतर्गत अपीलीय न्यायालय से अनुमति लेकर डिक्री को चुनौती दे सकता है।

न्यायालय यह जाँच करेगा कि C का संपत्ति में वास्तविक कानूनी हित है या नहीं और क्या डिक्री से उसके अधिकारों को नुकसान पहुँचा है।

उदाहरण 2: स्वतंत्र संपत्ति अधिकार को प्रभावित करने वाला समझौता

मान लीजिए दो व्यक्ति किसी संविदात्मक विवाद का समझौते से निपटारा कर लेते हैं। लेकिन उस समझौते में ऐसी भूमि भी शामिल कर दी जाती है, जिस पर किसी बाहरी व्यक्ति का स्वतंत्र रूप से स्थापित कानूनी अधिकार है।

ऐसी स्थिति में वह बाहरी व्यक्ति अपीलीय न्यायालय से अनुमति लेकर डिक्री को चुनौती दे सकता है, बशर्ते वह अपना कानूनी हित और उस पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव दिखा सके।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

Girishbhai Natwarlal Patel v. Gautam Punjabhai Palkhiwala (2026 INSC 1177) में सुप्रीम कोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया कानून के एक महत्वपूर्ण पहलू को स्पष्ट किया है।

हालाँकि CPC की धारा 96(3) सामान्यतः सहमति से पारित डिक्री के विरुद्ध अपील पर रोक लगाती है, लेकिन इस प्रतिबंध को ऐसे व्यक्ति पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता जिसने न तो समझौते में भाग लिया और न ही अपनी सहमति दी, जबकि उसके स्वतंत्र कानूनी अधिकार उस डिक्री से प्रभावित हो रहे हों।

अपीलीय न्यायालय से अनुमति प्राप्त करने की शर्त यह सुनिश्चित करती है कि केवल वास्तविक कानूनी शिकायत रखने वाले व्यक्ति ही इस उपाय का लाभ उठा सकें।

इस प्रकार यह निर्णय एक ओर समझौता डिक्री की अंतिमता और दूसरी ओर तीसरे व्यक्तियों के स्वतंत्र कानूनी अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न केवल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति समझौते का पक्षकार था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उस डिक्री से उसके किसी वास्तविक और कानूनी रूप से मान्य अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1. क्या कोई तीसरा व्यक्ति CPC की धारा 96 के अंतर्गत समझौता डिक्री को चुनौती दे सकता है?

हाँ। ऐसा व्यक्ति जो न तो मूल मुकदमे का पक्षकार था और न ही समझौते में शामिल था, यदि उसके स्वतंत्र कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं, तो अपीलीय न्यायालय की अनुमति लेकर अपील कर सकता है।

प्रश्न 2. क्या CPC की धारा 96(3) समझौता डिक्री के विरुद्ध प्रत्येक अपील पर रोक लगाती है?

नहीं। यह उन पक्षकारों की अपील पर रोक लगाती है जिन्होंने सहमति से डिक्री प्राप्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र कानूनी अधिकारों का दावा करने वाले वास्तविक तीसरे व्यक्ति पर यह प्रतिबंध स्वतः लागू नहीं होता।

प्रश्न 3. क्या तीसरा व्यक्ति समझौता डिक्री को रद्द कराने के लिए अलग दीवानी मुकदमा दायर कर सकता है?

आदेश 23 नियम 3A सामान्यतः उस आधार पर अलग वाद दायर करने पर रोक लगाता है कि डिक्री का आधार बना समझौता अवैध था। गैर-पक्षकार के लिए उपलब्ध उचित कानूनी उपचार उसके स्वतंत्र अधिकारों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्धारित होगा।

प्रश्न 4. क्या तीसरे व्यक्ति को अपील के लिए न्यायालय की अनुमति लेना अनिवार्य है?

हाँ। गैर-पक्षकार को अपीलीय न्यायालय से अनुमति प्राप्त करनी होगी और यह दिखाना होगा कि डिक्री से उसका वास्तविक कानूनी हित प्रभावित हुआ है।

प्रश्न 5. वर्ष 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी स्थिति को किस मामले में स्पष्ट किया?

Girishbhai Natwarlal Patel v. Gautam Punjabhai Palkhiwala (Dead) by LRs & Ors., 2026 INSC 1177 में। यह निर्णय 30 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया था।

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Abhisek

Student LLB (CCSU Campus)